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Monday, June 25, 2012

No title ....


जो शाम हुई सो डूब गया ..
ऐसा सूरज किस काम का ?

जो बदले हालात छूट गया ,
ऐसा साथ किस काम का  ?

तेरे भरोसे अकेला चल पड़ा,
तेरा  हौसला सिर्फ नाम का ?

मेरा नाम फिर गुमनाम है,
मेरा पता किस काम का ?

मेरे ईमान का मैं गवाह हूँ,
पूछना क्यों किस दाम का ?

तेरे जवाब फिर हज़ार है ,
हर सवाल का कत्लेआम सा  ?

मेरा आइना अब साफ़ है,
पर मेरा चेहरा बदनाम सा ?

मेरा घुटनों में कोई चोट है ,
और तेरे लिए मैं नाकाम सा ?

-Mayank Goswami

Wednesday, June 20, 2012

ये कविता नहीं है ..


अब बताओ ,
इस नए शहर का नाम क्या है ?
अरे शहर नया नहीं ,
ये तो बस नाम बदला है ...
और लोग, वो वैसे ही है क्या ?
वो तो तुम ही जानो ...
लेकिन ,
यादो की पोटली को खोलके
आज जो पता मिला है,
उसका पता तो इस शहर में ही नहीं ...
मिल ही नहीं रहा ,
न तो पता ,
और न ही वो जिसका ये पता था !
छोडो ...
और कहो ..
इस फ्लाई ओवर के पीछे ही था ना..
तुम्हारा घर ,
जो हर साल बदलता था ,
आखिरी बार यही तो था ,
जहाँ तक मुझे याद है ?
नहीं ,
वो तो गुरूद्वारे के सामने था,
यहाँ से तो वो सड़क जाती थी
और वहाँ से दिखाई देता था,
ये फ्लाई ओवर ..
हाँ, याद आया ,
उम्र बढ़ी है
और याददाश्त घटी है ..
और वहाँ पे हम ,
चाट खाया करते थे ,
जेब में होते थे तब दस रुपये ,
और मैं सबसे अमीर आदमी !!
हाँ ,
स्कूल तक पैदल जाने की सनक ,
याद है ,
साइकिल पे बैठकर ,
शहर का चक्कर ,
क्यों नहीं ,
मुझे तो वो भी याद है ,
प्यार इश्क सब फर्जीवाडा ,
पैसे ने सारा खेल बिगाड़ा !
हाँ ,
यही बात नहीं बदली तबसे,
आज तक ,
पैसे ने बिगाड़े है ,
सारे खेल,
कंचो से गोल्फ का सफ़र ,
इसी पैसे पे होता है ,
है ना ?
हाँ,
और प्यार का ढलना भी ,
इसी पैसे पे होता है ..
वैसे क्या दिया इस पैसे ने ?
सुकून , उम्मीद , ज़िन्दगी ?
ना ..
लेकिन कैसे नापोगे ,
कितने  सुकून है
और कितनी लम्बी ज़िन्दगी ,
लेकिन एक बात है ,
तुम्हारा साथ जबसे छोड़ा है ,
आराम बहुत है ..
तुम ,
कल भी यूँ ही भटकते थे,
पुराने शहर में ,
और आज तुम ,
शहर को तलाश रहे हो,
फिर से ,
उसी नाम के सहारे,
जो गम हो चुका है ...
होपलेस ..