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Sunday, January 18, 2026

घर

आख़िर में सबको लौट जाना चाहिए,

वहाँ जहाँ घर हो —

पक्षियों की तरह।


उसी घोसले में,

जहाँ कलरव था,


पलट लेना चाहिए पन्ने किताब के।

उलट लेना चाहिए बचपन के चित्र,

मुड़कर देख लेना चाहिए बचपन।

गुज़र जाना चाहिए स्कूल के रास्ते से,


आँख भर देख लेना चाहिए,

पुरानी गोली बिस्किट की दुकान को।

उस साफ़ सुथरे नीले आसमान को,

उम्मीद पे टिके हुए पुराने मकान को।

घर वाली गली के आख़िरी छोर को,

दीवारों पर बने गेंदों के निशान को।


सहलाना चाहिए चोटों के निशान को,

उस असुविधा को भी

एक बार फिर से,

पूरे जतन से भोग लेना चाहिए,

इस बार घर को 

सिर्फ देखकर आने के लिए नहीं।

बल्कि आख़िर में

अपने अपने घर लौटने के लिए।


~ मयंक 

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