कविताएं और भी यहाँ ..

Thursday, December 15, 2011

यूँ सोचता हूँ...


आज जो फुर्सत में हूँ तो यूँ सोचता हूँ,    
जरूरते क्या हैं और मैं क्या खोजता हूँ |
थोड़ी सी जमीन और क्या थोडा आसमान,
क्या मैं जिंदा हूँ जो जिंदादिली खोजता हूँ |

आज जो फुर्सत में हूँ तो यूँ सोचता हूँ, 
कि जब मैं आईने में अक्स देखता हूँ ,
शायद लकीरों में  खोया वक़्त देखता हूँ ,
जब मैं आईने के उस तरफ से देखता हूँ |

आज जो फुर्सत में हूँ तो यूँ सोचता हूँ, 
क्या मैं दोस्तों में भी हमजुबां ढूँढता हूँ ,
मैं किस पर भरोसा करू और कैसे करू ,
जब भरोसे में भी मैं फायदा देखता हूँ  |


आज जो फुर्सत में हूँ तो यूँ सोचता हूँ, |
कभी किसी ठोकर पे गिरा हूँ जब भी ,
तो सिर्फ मुझपे जमी नज़रों की है फ़िक्र ,
या कभी खुद खड़े होने की जुगत देखता हूँ |

तेरा किया सब तुम्हे ही हो मुबारक ,
मैं तुझमे कहाँ अब खुद को देखता हूँ ,
आजकल दूर जाते हुए सायों में अक्सर ,
मैं बेशर्मी से टूटता हुआ भरोसा देखता हूँ  |

आज कल जब फुर्सत है मुझे ,
तो मैं बहुत सोचता हूँ,
बहुत सोचता हूँ |
-मयंक गोस्वामी 

Sunday, November 20, 2011

वो परिंदे जब पेड़ो से उड़ गए

ये कविता विचलित मन के लिए ....

दिल में कितना शोर कर गए,
वो परिंदे जब पेड़ो से उड़ गए |
हम  साथ  में  हँसे , बहुत  हँसे
साथ  में  रोये,  बहुत  रोये |
फुर्सत मिली तो क्या सोचा कभी ,
उस मोड़ पे ही क्यों मुड़ गए |
सारे शौक अब अलमारी में रखे है,
तुम क्या गए,सब अरमान ले गए |
मैं नहीं चाहूँ तो भी क्या रुकता  है,
दिल है, अपनी मर्जी ही धड़कता है |
सफ़र में रहे और तुमको लगा कि,
शायद कुछ और ही जरूरी है ,
हम नीव के पत्थर ही तो  थे ,
गुमनाम है और बहुत नीचे दब गए |
जब मुड़ के देखो तो बहुत पीछे तक,
तो सिर्फ सन्नाटा ही है अब बीच में ,
और कुछ आवाजे आती है कभी कभी ,
कि,
हम  साथ  में  हँसे , बहुत  हँसे
साथ  में  रोये,  बहुत  रोये |
 

Saturday, November 12, 2011

दोस्ती और ...

ये पंक्तिया ४ महीने पहले लिखी गई थी... फ्रेंडशिप डे के दिन ..
 
 
आज  मेरी  पीठ  तेरी  तरफ  हो  तो  भी  खंजर  न  उठाना ,
आज  तो  दोस्तों  के  दिए  ज़ख्म  सहलाने  का  दिन  है ...
कभी  तो  दोस्त  होने  का  फ़र्ज़  अदा  कर  और  मुझे  बख्श  दे ,
कोई  कह  गया  है कि आज फिर तेरी दोस्ती को आजमाने का दिन है
  ...
 

Monday, August 22, 2011

मैं

इंसानियत का सबसे बदसूरत चेहरा हूँ,
हाँ मैं वही दो कान वाला बहरा हूँ |

मदद की गुहारे मुझे सुनाई न दे,
वो रौशनी रोकने वाला कोहरा हूँ |

मैं कंधो पे रास्तो की तरह चढ़ा हूँ,

मैं आदमी एक पर अन्दर से दोहरा हूँ |


मेरे साए मेरे साथ नहीं चलते ,
मैं सफ़ेद रौशनी वाला अँधेरा हूँ | 

Sunday, August 21, 2011

भीड़ में मेरा अकेलापन ...


मैं तुमको समझने की कोशिश में,
खुद को समझ रहा हूँ. 
यूँ लगता है कि मैं ,
खुद को खोल के पढ़ रहा हूँ  | 
कुछ उलझी - सुलझी सी ,
आधी - अधूरी सी,
कहानी की तरह ,
तुम एक पहेली जैसा ,
अंत हो मेरा |
मेरे सारे कयास,
मेरे सारे अनुमानों को ,
झुठला देती हो तुम .
कई बार खुद उलझकर ,
मुझको सुलझाती हो तुम |
कभी कथा व्यथा, 
कुछ सुनी अनसुनी ,
कविता की तरह ,
तुम एक पंक्ति का ,
अंत  हो मेरा |
मेरी सारी कमियों को ,
कितनी आसानी से 
छुपा देती हो तुम |
कई बार खुद को खोलकर,
मुझे पढ़ाती हो तुम | 
तुम जीवन हो,
उलझन हो, 
अनबन हो , 
सौंदर्य हो ,
पूर्णता हो | 
अपने सारे प्रयासों से भी ,
जो न कर सका ,
मेरे उस अपूर्ण स्वप्न का 
अंतिम जरिया हो तुम | 
तुम शरीर नहीं , 
आत्मा हो , 
और उस पर किसी का 
अधिकार नहीं , 
फिर भी कितनी चंचल ,
मोहक ,
महक, 
हंसी हो तुम  |
तुम केवल तुम हो ,
तुम रौशनी,
तुम उम्मीद , 
तुम आशा,
और तुम्ही अंत हो | 
तुम्हे पता है कि,
मैं क्या हूँ ,
फिर भी 
इस रास्ते के पत्थर  का  
देवता हो तुम |
मैं धूल ही सही , 
जो उड़ता हूँ ,
इधर उधर ,
फिर भी तुम तक पहुँचता तो हूँ ,
चाहे हर बार कोई मुझे ,
वहां से पोछ दे ,
पर मैं ,
कोई अवसर नहीं छोड़ता ,
तुम तक पहुचने का | 
मैं हसरत, 
मैं उम्मीद ,
मैं सपना 
बनकर जीना चाहता हूँ | 
मैं तुम्हारे स्पर्श को , 
अपने पास रखना चाहता हूँ |
तुम तक नहीं ,
तुम्हरी आत्मा तक
पहुचना चाहता हूँ | 
तुम्हारी सारी सफलताए ,
खुशियाँ ,
मेरे लिए धरोहर है ,
सारे जीवन के लिए 
उस याद को संजोकर,
अपनी स्मृति में रखना चाहता हूँ | 
तुम जीवन हो,
श्वाश,
धड़कन, 
चेतना ,
और तुम्ही सप्न्दन हो |
तुम हल हो 
जीवन कि पहेली का ,
सारी समस्याओं का 
समाधान हो तुम |
तुम हो तो ,
ईमान  है ,
तुम कारण हो ,
मेरे उजलेपन का ,
तुम मेरे ईमान का कारण हो | 
मेरे अकेलेपन में भीड़ हो तुम ,
और भीड़ में मेरा अकेलापन | 
तुम्ही कल्पना,
तुम्ही वास्तविकता ,
तुम्ही स्वप्न,
तुम्ही स्पर्श,
तुम्ही सनिध्याम 
तुम देवत्व हो , 
तुम्हारा हलके से खुद को नकारना , 
मुझे समझाना,
खुद को उलझाना , 
तुम सीमा हो एहसान की,
और मैं कृतज्ञ  हूँ , 
तुम्हारे साथ के लिए ,
जरूरत के वक़्त 
बड़े हुए उस हाथ के लिए | 
रोते वक़्त ,
कंधे के साथ के लिए | 
मेरे लिए ,
तुम कविता हो, 
कहानी हो,
और शायद 
पूरा एक काव्य हो | 
पर जो भी हो तुम ,
मुझे इतना पता है ,
कभी चाहे ,
तुम कितनी भी , 
कठिन,
अबूझ, 
मुश्किल,
क्लिष्ट हो जाओ ,
सबके लिए ,
पर उन सबसे अलग,
मेरे लिए आसान हो ,
और शायद इस जीवन में ,
सबसे महत्त्वपूर्ण , 
या,
एक शब्द में कहना चाहू ,
तो ,
अमूल्य हो तुम |

-- मयंक गोस्वामी 

फासला ?


दुःख से दुःख के बीच एक हंसी ही तो फासला है,   
वर्ना अब तक तेरे मेरे बीच में और बदला क्या है | 

सपनो की दुनिया में नींद नहीं आती थी तुमको,
और अब नींद में तुमने सपनो को ही तो बदला है | 

कितने अफ़साने अब बाकी रह गए तेरे मेरे बीच,
इन  सारी कहानियो का एक ही तो फलसफा है |

सच जानले कि मैं नहीं बदला पर तुझे ये दिक्कत है,
तेरे लिए  मेरी शख्सियत का सच ही तो बदला है |

मैं टूटकर यूँ ही इधर उधर बिखरता भी रहू तो क्या,
तेरे लिए तो तस्वीर का सिर्फ फ्रेम ही तो बदला है | 

मैं इतना नकारा नहीं समझा गया पहले कभी भी,
लेकिन इस बार देखो तो  हवाओं ने क्या रुख बदला है |

फूल या शूल ?


मैंने चुन रखे हैं 
वो सारे फूल ,
जो काम आने है मेरे जाते वक़्त,
(कौन फूल चढ़ाएगा मेरे जनाज़े पेउम्मीद कम ही है).
पर तेरी राह में आने वाले,
सारे शूल तो मैं ,
पहले चुन कर अलग रख दिए थे,
(उन्ही शूलों में ही तो पिरोई  है आखिरी माला ).
वैसे बहुत फर्क नहीं था,
जब चुन रहा था शूल,
वही तो अब फूल बन गए है,
मेरे आखिरी सफ़र के लिए.
और फूलों की बात कौन करेगा,
उनसे ही छिले है ,
मेरे हाथ ,
तुमने देखे नहीं ?
जब ख़ुशी ही दर्द देने लगे ,
तब ,
फूल और शूल में 
कितना फर्क रह जाता है,
बोलो ?
वैसे ,
मेरे अन्दर भी 
एक अदद  इंसान रहता था,
(जिसे दर्द भी होता हैसच! )
जाने कब पहचानोगे  तुम उसे ,
या फिर कभी ,
पहचानोगे तुम ?

Friday, August 12, 2011

ये आज़ादी कम है उनके लिए

ये आज़ादी कम है उनके लिए
उन्हें थोडा वक़्त  और चाहिए ..
अभी तो सिर्फ लूटा है देश,
उन्हें बेचने का हुनर चाहिए |
 
ये आज़ादी कम है उनके लिए ,
उन्हें थोड़ी और फ्रीडम  चाहिए.
अभी तो सिर्फ खून है निकाला,
इसकी नुमाइश का समय चाहिए |
 
ये आजादी कम है उनके लिए,
कि थोड़ी सहूलियत और चाहिए,
अभी तो गरीब का सिर्फ पेट है भूखा,
उन्हें भूख से बिकती आत्मा चाहिए |
 
ये आजादी कम है उनके लिए ,
कि कुछ लोग अभी भी खड़े है,
सपने तो ख़तम कर ही दिए है,
अब उन्हें गूंगी जुबान चाहिए |
 
ये आजादी कम है उनके लिए ,
अभी सिर्फ ६४ साल ही है बीते,
उन्हें १०० साल और दे दो कोई,
चिथडों में लिपटा हिन्दोस्तान चाहिए |

Saturday, January 15, 2011

आखिरी अलविदा ...

इस ब्लॉग पर मैंने आखिरी कविता कुछ दिन पहले लिखी थी.. लेकिन अब शायद कविता लिखने का हुनर गायब हो गया है रातो रात.. !! अब शायद कभी कुछ नहीं लिख पाऊंगा ... या हो सकता है कुछ दिनों बाद फिर से कोशिश करूँ ... ये ब्लॉग एक कोशिश थी कि जब मैं न रहू तब कोई तो इन कविताओं के द्वारा मुझे जान पाए.. पर लगता है अब कारण ख़तम हो गए है ...

नए कारण मिलने तक .. अलविदा..  हो सकता है ये आखिरी अलविदा हो या हो भी सकता है मैं वापस लौट कर भी आऊं .. लेकिन जब तक मैं वापस नहीं आता तब तक के लिए.. आप सब का शुक्रिया... यहाँ आने के लिए .. इसे सराहने के लिए.. आप सबका दिल से शुक्रगुजार हूँ... और शायद आप सब ही मेरी अगली प्रेरणा  बने जो मुझे कुछ और लिखने का कारण दे..

धन्यवाद ..
मयंक गोस्वामी

Monday, January 10, 2011

प्रेम -५

कुछ जल रहा है अन्दर,
दिल होगा ,
नहीं वो तो कब का ,
डस्ट बिन में फेक दिया था
तो इमोशंश ?
नहीं, वो तो तुमने कहा था,
कि कभी थे ही नहीं मुझमे ?
तो फिर कोई बीमारी है ?
कि अन्दर कुछ जला दे ,
ऐसी किसी बीमारी का नाम पता है ?
नहीं तो ..
तो फिर ?
ईर्ष्या होगी ..
हाँ मुझे अतीत से है ईर्ष्या ?
तुम डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाते ?
क्या दिखाऊ ?
शायद कोई सपना जला है ,
और धुंआ बन के उड़ गया ..
ऐसा भी होता है कभी,
कि सपने जल जाए ?
नहीं, सुना तो नहीं मैंने ,
लेकिन आँखों में चुभने वाले,
सपने देखे है ..
जब  लोग  बदलते  है , 
तो  शायद  सपने  जलते  हैं|
वही होंगे ..
झूठी उम्मीदों वाले सपने,
अच्छा हुआ जल गए |
नई शुरुआत करना..
लेकिन अब तो सपने ही नहीं दिखते,
तुमसे बात करना बेकार है,
पहले तो नहीं था ?
समय के साथ सब बदलता है,
लोग भी , अपने भी ?
इसके अलावा,
कोई और बात कर सकते हैं ?
कुछ है ही नहीं ?
मुझे नहीं करनी बात तुमसे |
यही तो जलाता है कुछ ..
शायद अपनापन ?
हाँ वही जलता है हर बार ,
और गाँठ छोड़ जाता है ,
फिर से जलने के लिए ...

Friday, December 10, 2010

अब अवशेष नहीं ...

मैं मुड़कर अब क्यों देखूं  पीछे ,
जहाँ  रहा अब कुछ शेष नहीं |
जीवन में चलना है, बढना है ,
नियति मेरी बनना अवशेष नहीं |
मैं अथक, अमिट रास्तो का राही,
लक्ष्य अनन्त है, कोई प्रदेश नहीं |
पथिक हूँ, साथी कई मिलते है ,
कोई बुरा नहीं, कोई विशेष नहीं |
मैं हूँ आभारी इस जीवन का ,
जिसने धैर्य दिया, आवेश नहीं |
मैं नहीं किसी पटल का ध्रुव तारा,
मैं विनम्र बहुत हूँ, आदेश नहीं |

Wednesday, November 24, 2010

प्रेम -४

मोहब्बत का रंग फिर दागदार निकला ,
इस बार भी वो एक किरदार निकला ..
जो खुशियों के चश्मे में नहाने गया था,
बाहर जब भी आया, तार तार निकला |
बहुत बेजुबां निकले  दर्द और अफ़साने,
उस गली से मैं फिर भी बार बार निकला |

Saturday, November 13, 2010

प्रेम - 3

काश कभी जो तुमसे शुरू हो ,
कोई एक ऐसी शाम हो जाए |
की गर तू कभी याद ना आए ,
तो ये शख्स गुमनाम हो जाए |
ज़िन्दगी में तू है, ये बहुत है  ,
ये सफ़र थोडा आसान हो जाए |
मैं क्यों तुझे यूँ देखू इस तरह,
कि तू बेवजह बदनाम हो जाए ?
ज़िन्दगी है रुक रुक के चलती है,
तेरी बाहों में ही अब शाम हो जाए | 
मैं थक जाता हूँ यहाँ पे आजकल,
अपना कन्धा दे, थोडा आराम हो जाए|
अब तू ही बस बोलती रहे सब कुछ,
मैं सुनु और दुनिया बेजुबान हो जाए | 

Monday, November 8, 2010

प्रेम ? - भाग -२

अपनी पिछली कविता प्रेम लिखने के बाद एहसास हुआ की बात तो अभी ख़त्म ही नहीं हुई,  तो सोचा कि मैं तब तक लिखूंगा इसे जब तक सब कुछ नहीं लिख डालता ... जो भी मन में है या जो भी देखा सुना है मैंने जीवन में .. तो पिछली कविता के आगे की बात भी पढ़िए .. इस कविता में ( इसके पहले अगर आपने मेरी कविता "प्रेम ?" न पढ़ी हो तो कृपया उसे एक बार पढ़े ताकि प्रवाह बना रहे, इस कविता के ठीक नीचे है  ) .

मैं अब तक यही समझा,
कि तुमने प्रेम भी किया है,
तो दया जानकर,
और मैं याद भी करता हूँ ,
तो दुआ मानकर |
तेरे न होने का ,
इतना फर्क तो पड़ा है मुझे ,
कि अब रातो को जागता हूँ,
मैं इबादत जानकर |
तुम्हारे स्पर्श को धो डालने की,
वो सारी कोशिशे,
जब नाकाम हो गई,
तो अपना लिया है मैंने,
उसे भी रिवाज़ मानकर |
तुमसे हुई उन सारी बातो का,
एक गट्ठा,
मैं अपने साथ लेकर,
चल रहा हूँ,
इस उम्मीद में,
कि किसी दिन शायद,
इसे पढने की शक्ति
मुझे मिल जायेगी |
तुमने तो अब
बोलना भी बंद कर दिया है ,
मुझसे,
मैं भी चुप बैठ जाता हूँ,
खुद को गूंगा मानकर |
मैं तुम तक पहुचने की,
कोशिशो में
अब भी जुटा हुआ हूँ,
तेरी यादो को ही,
एक सीढ़ी मानकर |
मैं उतना सफल न हो पाया,
न प्रेम में, न जीवन में,
जो पर्याप्त हो पाता,
तुम्हारे लिए,
पर अभी भी,
थोडा परेशान हूँ ,
कि,
प्रेम का मापदंड ,
क्या ये भी होता है?
पर तुम्हे तो पता है,
तेरी हर बात को,
मान तो लेता था मैं,
गीता का जानकर,
गंगा सा मानकर |

Friday, November 5, 2010

प्रेम ?

प्रेम

शायद तुम्हारे लिए
आसक्ति रहा हो,
पर मेरे लिए
कभी अभिव्यक्ति से आगे,
बढ़ ही नहीं पाया |
जब पीछे देखता हूँ,
तो पाता हूँ,
कि छूट गया है,
बहुत कुछ जो हो सकता है ..
आगे जाता हूँ,
तो दया आती है खुद पर .
कि कौन से चौराहे पे खड़ा हूँ,
जिसकी कोई भी राह,
घर को नहीं जाती |
मैं अपने में झाकने से
डरता हूँ,
कि जाने कौन सी याद ,
मुझे फिर से डरा देगी |
मैं तुम्हारे पत्र साथ तो रखता हूँ,
पर पढ़ नहीं सकता,
कि वो पढ़ते हुए,
हौसला टूटने लगता है |
और तुम्हारे चित्र,
मुझे कहते हैं कि,
तुम इतना भी नहीं कर पाए मेरे लिए |
मैं डरता हूँ,
आइना देखने से ,
वो हंसता है मुझ पर,
उसे भी डर नहीं लगता,
कि गर मैं तोड़ दूं उसे |
प्रेमगीत मुझसे कहते है,
तुम नाकाम हो ,
तुम शब्दों कि सुन्दरता को,
समझ ही नहीं सकते |
संगीत मुझे चिढाता है ..
मैं असमर्थ हूँ ,
और खुद से खफा,
टूटा हुआ ,
पर अभी भी उतना ही,
विनम्र हूँ और करीबी ?

मुझे नहीं पता ,
क्या पत्ते से टूटते ,
तुम्हारे प्रेम के इस भागीदार को ,
सम्हालोगे तुम ,
या किसी दिन सुबह,
आँगन में पड़े हुए पत्तो के ढेर सा,
घर के बाहर पटक दोगे,
जिसे सर्दी की किसी सुबह,
लोग आग समझकर,
ताप लेंगे |
चलो कोई तो संतुष्ट होगा मुझसे,
इसी बात पर,
अब टूट के गिरना
ही सही |

Saturday, October 23, 2010

विरोधाभास ...

मैं तो कहता था कि कोशिशों  का आदमी हूँ ,
फिर भी जाने क्यों ज़िन्दगी से हारता हूँ |
मेरे चलने की अब तक  कहानी भी यही है,
मैं अब हर एक नए कदम पे कराहता हूँ |
कभी तेरे वादे पे बड़ा यकीन हुआ था मुझे ,
पर खुद को हर ठोकर पे खुद ही सम्हालता हूँ |
मैं तनहा हूँ या अकेला हूँ, अभिमानी हूँ या दम्भी ,
मैं तेरी आवाज़ सुनने की ख्वाहिशो में जागता हूँ |
तुझे डर है क़ि मैंने सारे रास्ते रोक रखे है तेरे ,
उन गलियों  को कभी याद करो जिन्हें मैं संवारता हूँ |
तेरी आवाज़ में सुनने को तरस गया हूँ मैं जो आज,
उन  बातों को किसी तिजोरी में अब भी सम्हालता हूँ |
मुझसे बेहतर इस जहाँ में कई कंधे मिलेंगे  तुझे,
मैं अपने कंधे से यादो की गठरियाँ नहीं उतारता हूँ  |
मेरी उदासी को मैंने अपने हुनर से ही छिपाया है ,
मैं रोने के लिए आजकल सिर्फ कोने तलाशता हूँ ..

Thursday, October 21, 2010

हालात ..

वो आज मुट्ठियों  में समेटे सारा जहाँ चल रहे हैं,
हम, अँधेरे जिधर  है अब उस तरफ चल दिए है |
धुओं ने तो, छोड़ दी है अब शागिर्दी दीयों की ,
जो रौशनी के उतावले थे, वो खुद ही जल रहे हैं |
उसकी दोस्ती को ज्यादा मुफीद न समझना,
जो कभी हाथ मिलाया था , अब तक मल रहे है |
मैं शिकवा खुद से करू या गिला ज़िन्दगी से,
सबने सीखा है यहाँ पे, सब चालें  ही चल रहे हैं ..
वो बर्बाद होने की कोशिश में आबाद हुआ जाता था,
रौशनी को समेटे है  और अँधेरे पीछे चल दिए है |
मेरी उम्मीद पे अब मुझे ही यकीं कहाँ  है बाकी ,
मेरे इस हालात ने अब सारे चेहरे बदल दिए है |

Wednesday, September 8, 2010

ये पंक्तियाँ लिखी गई है एक बच्ची के दूसरे जन्मदिवस के अवसर पर मुद्रित होने वाले निमंत्रण पत्र के लिए.. पढ़कर देखिये ... 
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मैं और मेरी पूरे चाँद सी ये चिड़िया, पूर्ण होते है एक दुसरे से,
और जब इसके नन्हे से हाथ थोडा सा आगे बढ़कर छूते है मुझे ,
तो इसके होने का एहसास किसी ईश्वर की कल्पना से कम नहीं|
जीवन के ये दो छोटे से साल, इन मुस्कुराहटो में कैसे बीत गए,
और देखो एक नया साल फिर दरवाजे पे दस्तक देने आ गया |
तब समझ आया कि इन दो खूबसूरत सालो का शुक्रिया अदा करना है,
ताकि ये साल हज़ारो सालो तक यू ही दस्तक देते रहे मेरे दरवाजे पे..
और मेरे घर हर साल यूँ ही हंसती खिलखिलाती आती रहे ज़िन्दगी ..
आप भी आइयेगा, ज़िन्दगी को बढ़ते हुए देखने और उसे सराहने के लिए ...

Sunday, August 22, 2010

...उन सब लोगो के नाम ....

ये कविता है ...उन सब लोगो के नाम जिन्होंने ने इस अदने से आदमी की कविता को पूरे धैर्य के साथ सुना है.. बिना किसी शिकायत के.. ये उन सब लोगो के नाम जो मुझे केवल कविताओ के नाम से ही जानते है.. दूसरा कोई कारण ही नहीं और शायद इससे बेहतर कोई पहचान भी नहीं चाहिए मुझे .. क्योकि इससे अलावा साथ बैठने के सारे कारण बेमानी है !!!

प्रभाष , हन्नी "the" गर्ग , प्रशांत  भाई, अनिकेत, आनंद जोशी, शैलेन्द्र बहेरा, राम, पंड्या जी , चिली , अमित श्रीवास्तव, विमल प्रधान , मौलिक ,अमोल , श्वेता , मानसी , प्रमोद , गोविन्द, अमित भैया , हिमांशु, साकेत, आशीष अभिषेक, राजीव, मनीष निगम , संदीप दुबे , रवि , सचिन, चेतन , नीरव , सतीश पाटीदार , सतीश चटाप,निलेश और भी बहुत सारे लोग ... माफ़ करना अगर कोई छूट गया हो तो ... बस कागज पे नाम नहीं आया .. दिल में तो है ही ....
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कुछ शामे न ढलें,
तो बेहतर है,
कभी कभी रौशनी भी,
आँखों से सहन नहीं होती |
दोस्त होते है साथ जब ,
तो कैसी भी दिक्कत आये,
पर फरिश्तों की जरूरत नहीं होती |
सिहरन होती है,
हाथ छूटने के डर से ,
लेकिन जब तक डूबोगे नहीं ,
समंदर की इज्ज़त नहीं होती |
मैं जब होता हूँ राहों पे,
लोग कहते है,
धीमे चलता है ,
दोस्त होते तो कहते है ,
कि तेरी उड़ान,
इतने नीचे भी कम नहीं होती |
आज रात गुजर रही है,
चाँद भी गोल दिख रहा है ,
पर मेरे कमरे में ,
बिना दोस्तों के ,
आजकल रौशनी नहीं होती |
मेरी तमन्ना है कि  ,
साथ ख़तम न हो कभी,
लेकिन ये जो ज़िन्दगी है ,
साज़िश कर रही है ,
ये बेवफा किसी की,
महबूबा नहीं होती |
रास्ते बदल जायेगे,
कल तुम कही ,
और हम कही जायेगे |
पर एक सच यह भी है,
कि मैं नहीं रहूँगा
जिस दिन यहाँ पे,
कही दूर
दफ़न कर देंगे लोग मुझे |
पर तुम आओगे ,
जिस दिन ,
तब गजल होगी ,
एक शाम होगी ,
कुछ धुंआ होगा ,
और थोडा शुरूर भी
ऐसे भी  अब  ,
दोस्तों के बिना ,
कोई कविता नहीं  होती  |

बर्बादी

संसद से सड़क तक सिर्फ मुद्दा ये ही गरम है,
की आम आदमी आखिर इतना क्यों नरम है |
जो बड़ा है यहाँ वो नंगा दौड़ सकता है जहाँ में,
सिर्फ तमाशा देखने वाले की ही आँखों में शर्म है |

कहीं देश की बर्बादी का जश्न जोर शोर से है ,
और यहाँ आज रात भी भूखे सोने का मातम है| 
 कल तेरे उठ खड़े होने पे, चौतरफा सवाल होंगे, 
यहाँ ईमान को बेचकर आना सबसे बड़ा धर्म  है |

Saturday, August 14, 2010

तेरा होना ही ..

कभी तुम मुस्कुरा देते हो,

पलट कर,
और मैं खुश हो जाता हूँ,
तेरे हसते हुए चेहरे की
कल्पना में खोकर  |

तू जीवन दे रही है मुझे,
मुझमे अमृत सी फैलकर ,
मैं तृप्त सा हो रहा हूँ,
तेरी मौजूदगी को लेकर |

कभी तेरे स्वरुप को,
जान ही नहीं पाया,
मैं रह गया खुद में ही
बंधकर उलझकर |

तू हर गुजरते पल के साथ,
बड़ी होती गई ,
कभी मुझमे मिलकर ,
कभी मुझसे बिछड़कर !

Friday, July 30, 2010

परिवर्तन

मुझे उम्र भर  तसल्ली  की  दवाई देता रहा ,
मरते वक़्त  भी  वो  सिर्फ  दुआए देता रहा |
मेरे होने  न  होने से  फर्क  इतना पड़ा होगा ,
आंसू निकले भी मेरे लिए तो सफाई देता रहा |
ताउम्र शराफत से जीने का  क्या फायदा हुआ,
बेईमानो के शहर  में ईमान की दुहाई देता रहा |
किसी ने जब भी देखा  , उसे इस अंदाज में देखा ,
कि अन्धो के नगर में सबको दिखाई देना लगा |
हैरत में हूँ  कि  मेरा  चेहरा पहचान खोने लगा है ,
अलग बनने की कोशिश में भीड़ सा सुनाई देने लगा

Sunday, July 25, 2010

करीबी !!

मेरे कमरे की दीवार ,
मेरे हर दुःख को जानती है |
मेरे हर आंसू का,
कारण पहचानती  है |
जब मैं उदास होता हूँ,
तो वह कितनी चुपचाप होती है,
और जब होता हूँ व्यग्र,
थोडा चिंतित,
तब कितनी शांति से,
मेरी हर बात को सुनती है |
कभी कभी ,
रात रात भर मेरे साथ,
जागती है ;
और कभी ,
गले लगकर सोती है सारी रात  |
उसके रंग मेरा प्रतिबिम्ब हैं,
कभी देखो उस कोने को,
जब मैं रोया था बेसबब,
तब उसके भी आंसुओ की,
वह निशानी बाकी है |
वह बोली थी ,
हार गए,
अभी तो यह ज़िन्दगी आधी है |

Tuesday, June 1, 2010

जिनकी बातो से इत्तेफाक नहीं होता,
ऐसे लोगो का कभी इंतज़ार नहीं होता |
सुख है कि जैसे चमकती है बिजलियाँ,
दुःख का मौसम भी बरसात नहीं होता |

~-मयंक