कविताएं और भी यहाँ ..

Saturday, October 23, 2010

विरोधाभास ...

मैं तो कहता था कि कोशिशों  का आदमी हूँ ,
फिर भी जाने क्यों ज़िन्दगी से हारता हूँ |
मेरे चलने की अब तक  कहानी भी यही है,
मैं अब हर एक नए कदम पे कराहता हूँ |
कभी तेरे वादे पे बड़ा यकीन हुआ था मुझे ,
पर खुद को हर ठोकर पे खुद ही सम्हालता हूँ |
मैं तनहा हूँ या अकेला हूँ, अभिमानी हूँ या दम्भी ,
मैं तेरी आवाज़ सुनने की ख्वाहिशो में जागता हूँ |
तुझे डर है क़ि मैंने सारे रास्ते रोक रखे है तेरे ,
उन गलियों  को कभी याद करो जिन्हें मैं संवारता हूँ |
तेरी आवाज़ में सुनने को तरस गया हूँ मैं जो आज,
उन  बातों को किसी तिजोरी में अब भी सम्हालता हूँ |
मुझसे बेहतर इस जहाँ में कई कंधे मिलेंगे  तुझे,
मैं अपने कंधे से यादो की गठरियाँ नहीं उतारता हूँ  |
मेरी उदासी को मैंने अपने हुनर से ही छिपाया है ,
मैं रोने के लिए आजकल सिर्फ कोने तलाशता हूँ ..

Thursday, October 21, 2010

हालात ..

वो आज मुट्ठियों  में समेटे सारा जहाँ चल रहे हैं,
हम, अँधेरे जिधर  है अब उस तरफ चल दिए है |
धुओं ने तो, छोड़ दी है अब शागिर्दी दीयों की ,
जो रौशनी के उतावले थे, वो खुद ही जल रहे हैं |
उसकी दोस्ती को ज्यादा मुफीद न समझना,
जो कभी हाथ मिलाया था , अब तक मल रहे है |
मैं शिकवा खुद से करू या गिला ज़िन्दगी से,
सबने सीखा है यहाँ पे, सब चालें  ही चल रहे हैं ..
वो बर्बाद होने की कोशिश में आबाद हुआ जाता था,
रौशनी को समेटे है  और अँधेरे पीछे चल दिए है |
मेरी उम्मीद पे अब मुझे ही यकीं कहाँ  है बाकी ,
मेरे इस हालात ने अब सारे चेहरे बदल दिए है |

Wednesday, September 8, 2010

ये पंक्तियाँ लिखी गई है एक बच्ची के दूसरे जन्मदिवस के अवसर पर मुद्रित होने वाले निमंत्रण पत्र के लिए.. पढ़कर देखिये ... 
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मैं और मेरी पूरे चाँद सी ये चिड़िया, पूर्ण होते है एक दुसरे से,
और जब इसके नन्हे से हाथ थोडा सा आगे बढ़कर छूते है मुझे ,
तो इसके होने का एहसास किसी ईश्वर की कल्पना से कम नहीं|
जीवन के ये दो छोटे से साल, इन मुस्कुराहटो में कैसे बीत गए,
और देखो एक नया साल फिर दरवाजे पे दस्तक देने आ गया |
तब समझ आया कि इन दो खूबसूरत सालो का शुक्रिया अदा करना है,
ताकि ये साल हज़ारो सालो तक यू ही दस्तक देते रहे मेरे दरवाजे पे..
और मेरे घर हर साल यूँ ही हंसती खिलखिलाती आती रहे ज़िन्दगी ..
आप भी आइयेगा, ज़िन्दगी को बढ़ते हुए देखने और उसे सराहने के लिए ...

Sunday, August 22, 2010

...उन सब लोगो के नाम ....

ये कविता है ...उन सब लोगो के नाम जिन्होंने ने इस अदने से आदमी की कविता को पूरे धैर्य के साथ सुना है.. बिना किसी शिकायत के.. ये उन सब लोगो के नाम जो मुझे केवल कविताओ के नाम से ही जानते है.. दूसरा कोई कारण ही नहीं और शायद इससे बेहतर कोई पहचान भी नहीं चाहिए मुझे .. क्योकि इससे अलावा साथ बैठने के सारे कारण बेमानी है !!!

प्रभाष , हन्नी "the" गर्ग , प्रशांत  भाई, अनिकेत, आनंद जोशी, शैलेन्द्र बहेरा, राम, पंड्या जी , चिली , अमित श्रीवास्तव, विमल प्रधान , मौलिक ,अमोल , श्वेता , मानसी , प्रमोद , गोविन्द, अमित भैया , हिमांशु, साकेत, आशीष अभिषेक, राजीव, मनीष निगम , संदीप दुबे , रवि , सचिन, चेतन , नीरव , सतीश पाटीदार , सतीश चटाप,निलेश और भी बहुत सारे लोग ... माफ़ करना अगर कोई छूट गया हो तो ... बस कागज पे नाम नहीं आया .. दिल में तो है ही ....
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कुछ शामे न ढलें,
तो बेहतर है,
कभी कभी रौशनी भी,
आँखों से सहन नहीं होती |
दोस्त होते है साथ जब ,
तो कैसी भी दिक्कत आये,
पर फरिश्तों की जरूरत नहीं होती |
सिहरन होती है,
हाथ छूटने के डर से ,
लेकिन जब तक डूबोगे नहीं ,
समंदर की इज्ज़त नहीं होती |
मैं जब होता हूँ राहों पे,
लोग कहते है,
धीमे चलता है ,
दोस्त होते तो कहते है ,
कि तेरी उड़ान,
इतने नीचे भी कम नहीं होती |
आज रात गुजर रही है,
चाँद भी गोल दिख रहा है ,
पर मेरे कमरे में ,
बिना दोस्तों के ,
आजकल रौशनी नहीं होती |
मेरी तमन्ना है कि  ,
साथ ख़तम न हो कभी,
लेकिन ये जो ज़िन्दगी है ,
साज़िश कर रही है ,
ये बेवफा किसी की,
महबूबा नहीं होती |
रास्ते बदल जायेगे,
कल तुम कही ,
और हम कही जायेगे |
पर एक सच यह भी है,
कि मैं नहीं रहूँगा
जिस दिन यहाँ पे,
कही दूर
दफ़न कर देंगे लोग मुझे |
पर तुम आओगे ,
जिस दिन ,
तब गजल होगी ,
एक शाम होगी ,
कुछ धुंआ होगा ,
और थोडा शुरूर भी
ऐसे भी  अब  ,
दोस्तों के बिना ,
कोई कविता नहीं  होती  |

बर्बादी

संसद से सड़क तक सिर्फ मुद्दा ये ही गरम है,
की आम आदमी आखिर इतना क्यों नरम है |
जो बड़ा है यहाँ वो नंगा दौड़ सकता है जहाँ में,
सिर्फ तमाशा देखने वाले की ही आँखों में शर्म है |

कहीं देश की बर्बादी का जश्न जोर शोर से है ,
और यहाँ आज रात भी भूखे सोने का मातम है| 
 कल तेरे उठ खड़े होने पे, चौतरफा सवाल होंगे, 
यहाँ ईमान को बेचकर आना सबसे बड़ा धर्म  है |

Saturday, August 14, 2010

तेरा होना ही ..

कभी तुम मुस्कुरा देते हो,

पलट कर,
और मैं खुश हो जाता हूँ,
तेरे हसते हुए चेहरे की
कल्पना में खोकर  |

तू जीवन दे रही है मुझे,
मुझमे अमृत सी फैलकर ,
मैं तृप्त सा हो रहा हूँ,
तेरी मौजूदगी को लेकर |

कभी तेरे स्वरुप को,
जान ही नहीं पाया,
मैं रह गया खुद में ही
बंधकर उलझकर |

तू हर गुजरते पल के साथ,
बड़ी होती गई ,
कभी मुझमे मिलकर ,
कभी मुझसे बिछड़कर !

Friday, July 30, 2010

परिवर्तन

मुझे उम्र भर  तसल्ली  की  दवाई देता रहा ,
मरते वक़्त  भी  वो  सिर्फ  दुआए देता रहा |
मेरे होने  न  होने से  फर्क  इतना पड़ा होगा ,
आंसू निकले भी मेरे लिए तो सफाई देता रहा |
ताउम्र शराफत से जीने का  क्या फायदा हुआ,
बेईमानो के शहर  में ईमान की दुहाई देता रहा |
किसी ने जब भी देखा  , उसे इस अंदाज में देखा ,
कि अन्धो के नगर में सबको दिखाई देना लगा |
हैरत में हूँ  कि  मेरा  चेहरा पहचान खोने लगा है ,
अलग बनने की कोशिश में भीड़ सा सुनाई देने लगा

Sunday, July 25, 2010

करीबी !!

मेरे कमरे की दीवार ,
मेरे हर दुःख को जानती है |
मेरे हर आंसू का,
कारण पहचानती  है |
जब मैं उदास होता हूँ,
तो वह कितनी चुपचाप होती है,
और जब होता हूँ व्यग्र,
थोडा चिंतित,
तब कितनी शांति से,
मेरी हर बात को सुनती है |
कभी कभी ,
रात रात भर मेरे साथ,
जागती है ;
और कभी ,
गले लगकर सोती है सारी रात  |
उसके रंग मेरा प्रतिबिम्ब हैं,
कभी देखो उस कोने को,
जब मैं रोया था बेसबब,
तब उसके भी आंसुओ की,
वह निशानी बाकी है |
वह बोली थी ,
हार गए,
अभी तो यह ज़िन्दगी आधी है |

Tuesday, June 1, 2010

जिनकी बातो से इत्तेफाक नहीं होता,
ऐसे लोगो का कभी इंतज़ार नहीं होता |
सुख है कि जैसे चमकती है बिजलियाँ,
दुःख का मौसम भी बरसात नहीं होता |

~-मयंक 

Thursday, March 11, 2010

इस उम्र के रास्ते

इस उम्र के रास्ते भी  बड़े सयाने निकले ,
वही जा के अटके जहाँ से ज़माने निकले ..
कदम बढाये थे बड़ी एहतिहायत से मैंने,
घर को चला था, और ये मैखाने पे निकले |



जिन उम्मीदों के सहारे चल पड़े थे सफ़र पे,
साथ देने के वो सारे वादे झूठे तुम्हारे निकले |
मैं रास्ता तलाशने कि कोशिश में चलता रहा,
कही मुहाने बंद थे, और कही  चौराहे निकले |

Friday, February 26, 2010

चयन की आज़ादी !!

ये समंदर शोर मचाता रहा कहीं किनारों पर ,
और वो  बादल है जो कही चुपचाप बरस गए|
एक खुद में सिमट के खुश रहता है अहंकारी ,
और वो दूसरो की ख़ुशी के लिए खुद मिट गए |

महफ़िल में किसने किसे देखा, बड़ा सवाल है,
और हम उनकी नजरो के लिए ही सवरते गए |
कितनी तमन्नाओ को यु ही अधूरा छोड़ दिया ,
और वो हमें देखे बिना ही चुपचाप गुजर गए |

आदमी  खुद को ही देखता रहता है आईने में,
खुद नजरो में गिरते रहे, महफ़िलो में सवर गए |
मुद्दे बड़े है ज़िन्दगी को समझने के लिए दोस्त,
हम चौराहों पे बेबात क़ी बहस में ही उलझ गए |

कहते रहे आबाद रहो, बर्बादी के जश्न में डूबे हुए,
हम जश्न  मनाते रहे, वो हमसे आगे निकल गए |
कभी चाहा किसी ने, हम भी उन जैसे आबाद रहे,
अभिमानी हम, आसान रास्ते पर ही  बढ़ गए |


रास्ते खेल खेलते है गाहे बगाहे हर किसी के साथ,
कभी बहुत सीधे थे, और कभी मोड़ पर बदल गए |
तुम सीख लो मुझसे कि बादल बनना है या समंदर ,

बादल पसंद थे, पर अरमान समंदर से बड़े हो गए |

Tuesday, February 9, 2010

कृष्ण अर्जुन संवाद

कहा कृष्ण ने,
अर्जुन !!
ये क्या ,
तुम खुद को भूले ...
तुम गांडीव चलाना भूले ?
द्वापर में तो तुम,
चिड़िया की आँख
भेदते थे ,
और अब ऐसे भटके,
कि धनुष उठाना भूले |
इस पर,
अर्जुन बोला,
क्षमा करे भगवन,
पर मैं कुछ नहीं भूला,
भटके तो आप है,
तो अभी तक
गीता नहीं भूले |
अरे...
गांडीव चला के,
मुझे क्या अपना
"स्टेटस" गिराना है |
कुछ तो समझो,
ये ऐ के ४७ का ज़माना है |

Wednesday, February 3, 2010

मैं और वो !!

एक रात अपने दोहरे व्यक्तित्व के बारे में सोच रहा था तो कुछ पंक्तिया जेहन में आई.. बस उतार दिया कागज़ पर...  !!




आज फिर कट के गिरी है वो पतंग,
जिसने अपना ख्वाब आसमान रखा था,
कोई और सम्हालेगा इसके अरमान अब ,
"उन्होंने" कोई और भी मेहरबान रखा था,
अपनी आरजू को यूँ ना ख़त्म होने दीजिये,
कई लोगो को इसका एहतराम करना था |
सदिया बीतेगी पर दुनिया नाम उसका लेगी,
उसने कुछ यूँ अंदाज -ऐ- बयान रखा था
ख्वाहिशे बहुत सी बाकी है अभी दोस्तों,
सपनों में कुछ और भी सामान रखा था
उसकी याद आये तो बस आखे बंद करिए,
उसने भी आपकी नींदों का अरमान रखा था ....
उसे भूल मत जाना इतनी आसानी से कभी,
उसने भी मशहूर होने का इन्तेजाम रखा था ..
मैं और उसमे ज्यादा फर्क नहीं है दोस्तों,
कभी यूँ हुआ कि मैंने अपने लिए ही "उसका" ,
और उसने भी अनकहे फायदों के लिए मेरा ,
बेचारे ईमान को छोड़कर, दामन थाम रखा था !!

Wednesday, January 13, 2010

dosto ke liye !!!!

मैं जब रोशनी में आया तो उंगलिया उठने लगी ,
पर कुछ अपने ऐसे है जो मुझे खोने नहीं देते
कुछ हसरते तकती रहती है मेरी आहटे हरसू,
कुछ सपने मुझे कभी चैन से सोने नहीं देते
मैं जब यहाँ पूरा टूट के बिखरना चाहता हूँ ,
कुछ हाथ ऐसे है, जो जमीन पर गिरने नहीं देते
कभी कहीं जिंदगी में निराश मैं हुआ हु तो ,
ऊपर जो खुदा है वो मुझे कभी रुकने नहीं देते,
और कुछ साथी ऐसे बने है यहाँ पे मेरे हमदम,
कि खुद मिट जाए पर मुझे झुकने नहीं देते
मैं उनके इस अहसान को चुकाऊंगा कैसे ,
जो मुझे कभी जेब में हाथ डालने नहीं देते
कभी कश्तिया मन बना लेती है धोखा देने का
साहिल पे यही हाथ होते है जो डूबने नहीं देते

Tuesday, January 12, 2010

रफ़्तार का अंदाजा नहीं है ...

रास्ते बनेगे कैसे, इसका कोई कायदा नहीं है,
जिंदगी बहुत तेज है रफ़्तार का अंदाजा नहीं है |

ये जब यु मिले है, खो भी जाना है इनको यहाँ,
क्या इन्हें पता है, इश्क को रहम आता नहीं है |

तुम्हारी जिन आदतों से परेशान था जो मैं कभी ,
कब दोहराएगा वो फिर तू, ये मुझे पता नहीं है |

कभी दो बूँद पानी ही ज़िन्दगी दे दे किसी को ,
पर कौन है यहाँ पे जो सागर का प्यासा नहीं है |

जीने के करीने कुछ अलग है जो जहाँ से हमारे,
मतलब ये है क्या कि हमें जीना आता ही नहीं है |

हद तो ये कि आँखे बंद करके बैठे है लोग यहाँ,
सच तो ये है मौत का डर किसको डराता नहीं है |

भूल जाने को बोल रहा है दिल हर खुशनुमा लम्हा,
वक़्त कि बर्बादी है, जब वो सपनो में भी आता नहीं है  |

करीने , सलीके, इज्ज़त, सऊर, लफ्जों का क्या करना,
जब यहाँ पे शराफत का कोई एक पैमाना ही नहीं है |

मुद्दतो से सोच रहे है बदल जाऊँगा एक दिन मैं भी,
पत्थर नहीं बदलते जब तक कोई  तराशता नहीं है |

ज़िन्दगी का वक़्त बेवक्त इम्तिहान लेता है वो रकीब ,
अब तक मुझे सीधे से जवाब लिखना ही आता नहीं है |

जला दो ख्वाबो को, किताबो को, दफना दो  दूर मुझसे,
दिल की सुनता हूँ,सिवा इसके कुछ  आता ही नहीं है ||

Thursday, December 31, 2009

ये साल भी गुजर गया ,

ये साल भी गुजर गया ,
एक हवा के झौके की तरह ,
रात के एक सपने की तरह ,
अचानक छलक आये आंसुओ सा ,
आते जाते लोगो की तरह ,
रास्तो की तरह ,बादलो की तरह ,
धुप के जैसा , छाव की तरह ..
ये साल भी गुजर गया ..

ये साल मेरे लिए
उतना ही ख़ास रहा है ,
हर गुजरे हुए साल कि तरह ,
मेरे ख्वाबो का गवाह रहा है
नींद की तरह साथ रहा है ..
मेरी सारी इच्छाओ का आगाज़ रहा ,
हर गुजरे साल की तरह ,
ये जो साल भी गुजर गया ..

कभी तमन्ना इन्तेजार करती रही,
कभी वक़्त का ख्वाब रहा ..
कभी दोस्तों ने घेरा हुआ था ..
कभी तन्हाई ने साथ दिया ,
बस हमने मुडके न देखा ...
कभी ज़िन्दगी चुपचाप गुजरी ,
कभी हम गुजर गए बिना देखे,
और यु गुजरे की समझ ही न सके
इस गुजरे हुए साल की तरह |

Thursday, December 24, 2009

तेरे कारण ...

शुक्र है कि किसी इन्तजार में उम्मीद जिन्दा है ..
गर उम्मीद जिन्दा हो तो दिल में डर नहीं आता |

तुम्हारी याद आये न आये, दिन तो गुजर जाता है,
मुद्दा तो ये है कि दिल से तेरा ख्याल क्यों नहीं जाता |

एतिहायत जो बरतनी है तुझसे दूरी निभाने की,
वर्ना तुझे देखके मैं यूँ कभी पीछे वापस नहीं जाता  |

प्यास को दरिया में डुबाने की कोशिशों के बाद भी,
जाने होठो से आंसुओ का ये स्वाद क्यों नहीं जाता  |

कितनी तमन्नाये मचली और ख़तम भी हो गई वही पे ..
बस इन आँखों से एक तेरा ही सपना नहीं जाता ..|

यहाँ मेरे नाउम्मीद होने की सारी कोशिशे बेमतलब है ...
तू है या तेरी दुआए है, मैं ढंग से बर्बाद भी नहीं हो पाता |

Monday, December 21, 2009

? दौर ?


ये वो दौर है यारों जहाँ गरीब को मरने की जल्दी इसीलिए भी है,
कि कहीं ज़िन्दगी की कश्मकश में कफ़न महंगा न हो जाये ...
"Above quote I have heard somewhere and then I expand this idea ..."
और 
ये वो दौर भी है यारों जहाँ मैं तुमसे तेज़ चलने की कोशिश में इसीलिए लगा हूँ,
कि जो रोटी मेरी भूख की नहीं है वो कभी कहीं तुम्हे न मिल जाए ...
और ये दौर वो भी है यारो जहा तेरे कंधे पे मेरा हाथ इसीलिए भी जरूरी है ,
कि वक़्त कि इस दौड़ में कही तू मेरे आगे न निकल जाए |
और ये वो दौर भी है यारों जहाँ मेरे चेहरे पे मुखौटा इसीलिए भी जरूरी है, 
कि उभरते चेहरों की इस दुनिया में कही मेरा असल रंग न उतर जाए | - Mayank G

Wednesday, December 16, 2009

मैं कैसे भूल जाऊ |


कैसे  भूल  जाऊ  कि ,
तू  मेरा  ही  एक  हिस्सा  है  |
कैसे  भूल  जाऊ  कि 
तुने  ही  पूरा  किया  है  |
वो  तेरा  मुझ  पर  
खिलखिला  के  हसना ,
मेरे  बालो  पे  तेरी ,
अंगुलिया  फिराना |
मुझको  गले  लगाना 
और  देर  तक  रोना ,
मैं  कैसे  भूल  जाऊ  |

कभी  रातो  में  जागकर ,
खाना  पकाना ,
मुझको  खिलाना , 
खुद  भूखा  सो  जाना ,
मैं  कैसे  भूल  जाऊ  |
सारी रात  जागकर ,
मेरा  कुछ  भी  सुनाना
तेरा  उफ़  भी न   करना ,
सिर्फ  मुस्कुराते  जाना  |
होने  लगे  गर  चिड  इससे ,
फिर  भी  हाँ मिलाना 
तेरी  बाहों  में  ही ,
फिर  थक  के  सो  जाना  |
मैं  कैसे  भूल  जाऊ  |

कभी  अकेले  में  अपने  
सारे  राज  बताना  |
मुझसे  मेरा  हर ,  
राज  चुरा  ले  जाना  |
कभी  मुझे  छूना ,
कभी  छूने  न  देना ,
कभी  मेरे  कंधे  पे ,
टिक  कर  ही  दिन बिताना 
मैं  कैसे  भूल  जाऊ  |

आज  दूर  है  तू ,
तेरी  याद  पास  है ,
मुझे  भूख  भी  अब 
तेरी  तस्वीर  के ख्याल  
के साथ  ही  आती  है | 
मैं   जब  सोता  हूँ ,
तो  चादर  बन  जाती  है  |
कभी  मैं  तुझे 
बिछा  लेता  हूँ ,
कभी  तू   मुझे  
ओढ़  के  सो  जाती  है   |
मैं  कैसे  भूल  जाऊ  |

तू  मेरी  आदत  
हुआ  करती  थी  कभी ,
अब  मेरी  खामोशी  
बन  जाती  है  |
कभी  मेरी  
जागती  आखों  का 
शौक   थी तू ,
और  आज  नींद  में  
सपने  सी  
जरूरत  बन  जाती  है 
मैं  कैसे  भूल  जाऊ  |

मैं  कैसे  भूल  जाऊ ,
कि  तू  मेरी  माँ  जैसी  हो ,
और  कभी  मेरी  साथी 
बन  जाती  है  ..
मेरे  जीवन  का  हर  
समाधान  हो  तो  तुम ,
मैं  जब  कभी  
प्रश्न  होता  हूँ 
तब  तु  मेरी  लिए  
उदाहरण  बन  जाती   है  ..

मैं कैसे भूल जाऊ तुम्हे ... 

Tuesday, December 15, 2009

ख़ामोशी को भी सुना है |

सीने   में  टूटन  सी  इतनी  क्यों  है ,
हालात  से  क्यों  झगडा  हुआ  है  |
जहा  से  चले  थे  वही  पे  खड़े  है ,
दिल  जाके  तुझपे  ही  अटका  हुआ  है  |
वो  रास्ता  दिखाने  आया  था  मुझको ,
जो  पहले  ही  कही  गुमशुदा  हुआ  है  |
खुशनुमा  है  राते  फिर  भी  क्यों  ग़म  है ,
उम्मीद  पर  ही  तो  चाँद  लटका  हुआ  है |
इनायत  है  तेरी  कि  मुझको  यु  देखा ,
नहीं  तो  अभी  तक  ये  अनदेखा  हुआ  है  |
उसकी  आँखों  में  यु  डर दिख  रहा  है
वो  प्यार  के  नाम  से  ही  सहमा  हुआ  है  ..
तमन्ना  थी  चिरागों  से  अँधेरे  बुझायेगे ,
रौशनी  कि  उम्मीद  में   घर  ही  जला  है  |
कही  तो  साजिश   करती  है  ये  बारिश ,
मिटटी  के  घरोदो  में  ही  पानी  घुसा  है  |
साँसों का   चलना   तुझसे   ही   मुमकिन ,
जिन्दा हूँ जब  तक  तूने  थामा  हुआ  है |
तू   रगों   में  दौड़ता   रहे  भी तो   क्या ,
नदी   का   पानी   कब   नदी   का   हुआ  है |
तेरे  आने  कि  कोई  दस्तक  भी  नहीं  हुई ,
वर्ना  हमने  तो  ख़ामोशी  को  भी  सुना है  |

Wednesday, December 9, 2009

उलझन


सुकून  की  तलाश  में
यहाँ  सुकून  खो  गया  |
उलझनों  का नाम ही,
अब ज़िन्दगी हो गया |
जीते  है  लोग  यहाँ ,
औरो  की  आँखों  के
सपनो  के  लिए  |
बेगाने  सपनो  को  ही
ज़िन्दगी  का  सारा
अरमान दे  दिया    |
समंदर  भीग  रहे  है ,
अपनी  ही  लहरों  से  ..
और  कहीं  सूरज  की
जल्दी घर जाने की जिद ने
चाँद  को रात भर,
पहरेदारी  का  काम  दे  दिया |

Tuesday, December 8, 2009

tum kya ho ...


तुम
जाने  किसकी  किस्मत   हो ,
पर  जान  लो ,
की  तुम  मेरी  भी  हसरत  हो  |
मैं  हकीकत  का भरोसा
कैसे  करू ,
जब,
तुम  साँसों  की  तरह
ज़िन्दगी  की  जरूरत  हो  |
तुमको जानने का
जितना वक़्त मिला है मुझे,
तुम उस वक़्त की
मुझको नियामत हो |
क्या हुआ
जो वक़्त कम मिला,
हर किसी से यहाँ पे,
तुम उन चंद,
लम्हों की
मेरे लिए हिदायत  हो |
ये नवाजिश है
ये जान नहीं पाया  |
तुम ,
मेरे लिए ,
जिंदगी की साजिश हो,
या फिर,
ज़िन्दगी भर की,
मोहलत हो ....

Monday, December 7, 2009

पहचान

मुझे विश्वाश है ,
कि मैं
तुम्हे जानता हूँ
मुझे मालूम है ,
तुम्हे कब हसाना है ,
कब जगाना है ,
कब आना है पास ,
और कब तुम्हे ,
कुछ बताना है |
मुझे पता है ,
कि तेरे दिल में
अकेलापन कब होगा
और कब उस तन्हाई की,
 जगह ले  जाना है |
मैं तुम्हे,
अपने घर की तरह,
जानता हूँ ,
जिसका एक - एक कोना ,
पहचानता हूँ  |
कब कहाँ  से धूल ,
हटाना है,
कब किस सामान को,
करीने से लगाना है  |
तुम किसी  तस्वीर
की तरह नहीं हो,
जिसको कही सजाना है,
तुम,
उस रोशनदान की तरह हो,
जिसे मैंने बचपन से
आज तक,
एक ही जगह देखा है,
जिसे  कभी चाँद सा कोमल
और कभी रोशनी सा ,
सूरज बन जाना है  |

Friday, December 4, 2009

पड़ाव

सुबह का सूरज,
दोपहर का सूरज,
शाम का सूरज  |

सुबह रण में जाता हुआ योद्धा
दोपहर आग बरस|ता हुआ योद्धा,
शाम को वीरगति पता हुआ योद्धा |
यही तो जीवन के पड़ाव है,
जो सूरज एक दिन में दिखा देता है  ||