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Monday, January 10, 2011

प्रेम -५

कुछ जल रहा है अन्दर,
दिल होगा ,
नहीं वो तो कब का ,
डस्ट बिन में फेक दिया था
तो इमोशंश ?
नहीं, वो तो तुमने कहा था,
कि कभी थे ही नहीं मुझमे ?
तो फिर कोई बीमारी है ?
कि अन्दर कुछ जला दे ,
ऐसी किसी बीमारी का नाम पता है ?
नहीं तो ..
तो फिर ?
ईर्ष्या होगी ..
हाँ मुझे अतीत से है ईर्ष्या ?
तुम डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाते ?
क्या दिखाऊ ?
शायद कोई सपना जला है ,
और धुंआ बन के उड़ गया ..
ऐसा भी होता है कभी,
कि सपने जल जाए ?
नहीं, सुना तो नहीं मैंने ,
लेकिन आँखों में चुभने वाले,
सपने देखे है ..
जब  लोग  बदलते  है , 
तो  शायद  सपने  जलते  हैं|
वही होंगे ..
झूठी उम्मीदों वाले सपने,
अच्छा हुआ जल गए |
नई शुरुआत करना..
लेकिन अब तो सपने ही नहीं दिखते,
तुमसे बात करना बेकार है,
पहले तो नहीं था ?
समय के साथ सब बदलता है,
लोग भी , अपने भी ?
इसके अलावा,
कोई और बात कर सकते हैं ?
कुछ है ही नहीं ?
मुझे नहीं करनी बात तुमसे |
यही तो जलाता है कुछ ..
शायद अपनापन ?
हाँ वही जलता है हर बार ,
और गाँठ छोड़ जाता है ,
फिर से जलने के लिए ...

6 comments:

Solitary Reaper said...

Gahri anubhuti hai prem ki is kavita mein...lekin ise hamare jaise log bas padh hi sakte hain..samajh nahi sakte..

Mayank Goswami said...

mere liye bhi sirf likhna hi hai... usse jyada kuchh nahi..

Satya.... a vagrant said...

BHAI HAMARE LIYE TO YE PADHNA SAMJHNA OR MEHSOOS KARNA TEENO HAI.

Tanu Shukla said...

I like the poem and offcourse well understood. No its not just the poem to read only.Sapne lekin jaror dekhne chahiye,kabhi na kabhi to poore honge.....I understand, saare sapne nahi poore hote...
The poem is saying that you are emotional...:)

Reicha said...

Really worth reading :)

Mayank Goswami said...

thnx