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"मैं महसूस करता था की मैं अन्य लोगो से कुछ अलग हूँ, मेरा व्यक्तित्व अनोखा है , अद्वितीय है और समाज मुझे समझ नहीं सकता| साधारण लोग अत्यंत साधारण है, मेरी प्रतिभा के स्तर से बहुत नीचे है, मैं उन्हें जिस तरह चाहूँ, बहका सकता हूँ| मुझसे अपने व्यक्तित्व के प्रति एक अनावश्यक मोह, उसकी विकृतियों को भी प्रतिभा का तेज़ समझने का भ्रम और अपनी असामाजिकता को भी अपनी ईमानदारी समझने का अनावश्यक दंभ आ गया था | धीरे धीरे मैं अपने आप को ही इतना प्यार करने लगा की मेरे मन के चारो और ऊँची ऊँची दीवारे खड़ी हो गयी और मैं अपने स्वयं अपने अंहकार में बंदी हो गया, पर इसका नशा मुझ पर इतना तीखा था की मैं कभी अपनी असली स्थिति पहचान ही नहीं पाया |" धर्मवीर भारती जी की ये पंक्तियाँ, कुछ लोगो के लिए एक अद्वितीय रचना "सूरज का सातवां घोड़ा " का कुछ अंश हो सकती है, पर कभी कभी मेरे लिए ये एक अंतःकरण की आवाज़ है.. एक हर उस व्यक्ति के समान जो इस समाज में जी रहा है.. सान्त्व्नाओ के तले दबा हुआ, थोडा सा मार्क्सवादी और पूरी तरह अपनी ही तरह की दुनिया की कल्पना लिए हुए | हर उस व्यक्ति के लिए जिसके मन में संवेदना है पर वातावरण को समझ पाने की अक्षमता के कारण वह क़ैद हो रहा है .. अपने ही जाल में.. मेरी तरह ... आत्ममुग्ध, निर्लक्ष्य और थोडा सा अहंकारी |

कविताएं और भी यहाँ ..

Monday, May 28, 2012

मैंने देखा है..


गई शाम ज़िन्दगी को कसौटी पे कसके देखा है,
होते ही अँधेरा, परछाई को भी दूर जाता देखा है ...

देखा है बदलते रंगों को भी, जो बदस्तूर जारी है..
मैंने वक्ते जरूरत जेबों को होते हुए गहरा देखा है ...

मैंने तो ये भी देखा है कि वादों की उम्र कितनी है,
मैंने झुर्रियों से झांकता हुआ इंतज़ार भी देखा है ..

मैंने देखा है गिरगिटों औ' लोगों को साथ साथ,
मैंने तो सारी कसमों को भी रंग बदलते देखा है..

हर जुबाँ को उलटते पलटते देखा है मैंने बार बार,
मैंने आज ही हर शब्द का सही मतलब देखा है  ...

मैंने आँखों से परे देखा है और दिल से परे भी ,
मैंने आज ही कही खुदा का नया मतलब देखा है ..

मेरी आँखों पे ये पट्टी भी बंधी रहे, मुमकिन है, 
पर मैंने इन अंधेरो को उजालों से बेहतर देखा है 

Thursday, May 24, 2012

असमंजस


तो जो तुझे कभी याद नहीं करना ,
वो क्या है, सब तुम्हे याद रखना है !

अब कुछ जख्म यूँ  ही खुले रखना ,
वक़्त आने वाला आबाद रखना है  ...

मुंह फेर लिया उसने वक्ते जरूरत ,
भूल जा, बस करतूत याद रखना है ..

घर जला अपना, उजालो की खातिर ..
और सिर्फ  उजाले ही याद रखना है ..

साहिलों  पे बदनसीब ही डूबा करते है ,
अब  उथलेपन का हिसाब रखना है .. 

बड़े खुशनसीब हैं वो कुछ लोग यहाँ पे,
उन्हें सिर्फ अपना किरदार याद रखना है ..

और मैं क्या रखू साथ अपने, क्या छोडू,
मुझे बिला याद, वक़्त बेहिसाब रखना है  |

=>Mayank Goswami

Friday, May 11, 2012

तो याद करना छोड़ दिया ?


तो याद करना छोड़ दिया ?   

ह्म्म्म नहीं याद तो अभी भी करता हूँ..
बस अब यादो में रोना छोड़ दिया ..
जो सोना छोड़ना था मुश्किल बड़ा,
सो बस सपनो  में खोना छोड़ दिया ...
कि ये रास्ता बड़ा सख्त है फिर भी,
उस मोड़ को उसी मोड़ पे छोड़ दिया ...
देखो अब हँसना बहुत आसान हो गया,
उसी का का गम था उसी पे छोड़ दिया ..
एक ज़िन्दगी कम है कई कामो के लिए,
जो गैरजरूरी था  हालात पे छोड़ दिया |
कभी खो गया था जो तुममे एक उम्र,
उस उम्र को एक चादर से ओढ़ दिया ... 
फिर एक तू क्या घटा ज़िन्दगी से देख ,
मैंने  साथ  अपने हजारों को जोड़ लिया ..

Tuesday, April 10, 2012

मैं बड़ा जो हो गया हूँ ना !!


अब नहीं बनते दुश्मन मेरे
और नए दोस्त भी नहीं ...
अब खुद से ही सारे झगडे है
और खुद से सारी यारी भी |
 
अब नहीं बनाता मैं,
कागज़ के हवाई जहाज़,
अब जो बैठने लगा हूँ उनमे,
उड़कर कहीं दूर जाने के लिए ....
 
कागज़ की नाव तो हरगिज़ नहीं ,
तैरकर  कही दूर निकल जाती है ,
तो ताली भी नहीं बजाता मैं ,
और गीली होकर जब डूबती है,
तो अब रोता भी नहीं ...
 
कही किसी दीवार पे ,
या कापी के आखिरी पन्ने पे,
किसी कार के धूल भरे शीशे पे,
अपना नाम लिखना ?
वो कब का भूल चूका हूँ मैं |
 
अब मैं सिर्फ  हिसाब करता हूँ,
पैसो का,
कल का,
रिश्तों का,
ज़िन्दगी का ...
मैं बड़ा जो हो गया हूँ ना !!
 
 
 
 --mayank Goswami

Wednesday, February 22, 2012

मेरी पत्नी नेहा के लिए ...


कभी मैं सोचता हूँ ,
कि क्यों नहीं लिखता मैं ,
तेरे बारे में ,
क्यों नहीं उतारता,
कविताओं में तुम्हे ?
शायद  कविताएं मेरी ,
तुम्हे पाकर अमर न हो जाये,
इस डर से नहीं लिखता ,
नहीं चाहता मैं ,
कि कुछ भी रहे तेरे बारे में ,
पढने को ,
जब तुम यहाँ न हो ,
कि बहुत याद आओगे तुम,
हर शब्द के बाद ,
तुमसे लड़ना, झगड़ना ,
कभी हुआ ही नहीं
औरो की तरह ,
कि तुम चुपचाप ,
मुझे आत्मसात करते जाते ,
मेरी हर गलती पे ,
पर्दा डालते हुए ,
और तेरे इस विशाल व्यक्तित्व को,
शब्दों में बांधकर ,
मैं तुम्हे किसी सीमा में,
बांधना नहीं चाहता |
तुम,
आइना हो मेरे लिए ,
समझा हूँ जब ,
तुम नहीं हो आज आसपास ,
तो तुम्हे क्यों छोटा करू ?
कुछ लिखकर ..
तुम तो भावना हो,
जिसे मैं कभी शब्दों में,
बाँध ही नहीं सकता ...
तुम,
निरंतरता हो ...
निशब्द ,
आत्ममंथन की तरह,
मेरे अन्दर ही उपस्थित ..
तो क्यों बांधू मैं ,
शब्दों में तुम्हे ..
तू तो सारा आकाश है ,
जितना मैं देख पता हूँ ,
और कैसे लिख पाऊंगा ,
उस आकाश पे,
जो अनलिखा ही ,
पढ़ा जा सकता है | - mayank

Wednesday, February 8, 2012

यू गिरना ...


मैं कभी जो हार के गिर पड़ा,
वक़्त लगा पर फिर उठ गया |
और कभी गिरा किसी ठोकर पे ,
धूल झाड कर फिर खड़ा हुआ |
कभी दुःख ने गिराया धोखे से,
रोया, पोंछे आंसू और चल पड़ा |
यू गिरना पडना तो बस लगा रहा,
समझाता गया बचना है कहाँ-कहाँ |
कोई  बात तो है ऐसे गिरने में,
नई नसीहत लेकर हुआ खड़ा |
कभी आँखों से आंसू की तरह गिरा,
कि आचल में गिरा और सिमट गया |
पर किसी की नज़रो से ऐसा गिरना,
कि वो गिरता गया , बस गिरता गया,
और उठने कि कोई गुंजाइश ही नहीं ,
जो नजर से गिरा, वो दिल से उतर गया  |

Sunday, January 29, 2012

..........


हौसला टूटने की
कोई आवाज़ नहीं होती ?
कुछ ऐसी,
कि पहले,
चरमराये थोडा ,
थोडा गिड़गिड़ाये,
गिरे अपने घुटनों पे ,
और सूचित करे,
मैं टूटने वाला हूँ,
नहीं होता ऐसा, 
वो टूटता है,
झटके में ,
विश्वास   की  तरह ,
ईमान की तरह ,
इंसान की तरह  ...
और इनमे से ,
जब भी, कुछ भी ,
टूटता है ,
तो जुड़ता नहीं ,
वो ,
टूटने के बाद ,
चरमराता रहता है ,
आवाज़ करता है ,
कभी आँखों से बहते हुए,
और कभी ,
एकदम  चुपचाप ,
पर आवाज़ करता है ,
ताउम्र !

शौक


नहीं मिल रहे,
वो सारे शौक ,
जो एक दिन खासे गुस्से में,
किसी खूँटी पे टांग आया था ,
अब सिर्फ दिखता है,
शौक में छुपा हुआ गुस्सा ...
वो अरमान जो उस दिन,
किसी खीज में ,
अलमारी के एक कौने में ,
फेक आया था,
वो भी नहीं दिखता अब,
दिखती है तो सिर्फ खीज,
जो उसी कोने में पड़ी हुई,
चिढाती है मुझे बार बार ,
और एक अधूरा लिखा हुआ ,
उपन्यास भी है ,
जो उस शौक से उपजा था ,
अब उसे पढने की ,
कोई इच्छा ही बाकी नहीं है ,
लिखने की तो बात ही नहीं ,
बाकी है तो सिर्फ ,
उसे इतना ही रहने देने की जिद ,
काश मान ही लेता वो बात,
कि शौक से पैसा नहीं आता,
प्रतिष्ठा नहीं मिलती ,
मिलती है,
तो किसी फंतासी की तरह,
उलझी हुई सीख ,
कि दुनिया ऐसे नहीं चलती,
दुनिया वैसे नहीं चलती,
लेकिन कोई समझा ही नहीं,
कि दुनिया चलानी किसे है ,
जिंदगी चलानी थी,
वो शौक से चलती थी,
और शौक ही नहीं,
तो ज़िन्दगी भी ,
उसी खूँटी पे टंगी है,
पर वो भी दिखती नहीं,
सिर्फ टंगी है वही पे शायद ,
शौक की तरह ही ... 

Friday, January 20, 2012

खाली पेट ...


फिर सोचा, 
कि आज रात,
खाकर नींद को ही ,
चलाया जाए गुज़ारा  ;
कि आँखे 
बंद होने नहीं देता,
खाली पेट | 
उजालो में 
बहुत तलाशा ,
कि क्यों है वजूद ,
कि आँखे 
खुलने ही नहीं देता,
खाली पेट |
कभी धूप ही 
सेक ली,
पी ली ,
जी ली ,
खेल  ली ,
और खा ली ,
थोड़ी धौंस ,
नाश्ते में ,
दोपहर में ,
और एक अदद ,
शाम का खाना |
कि कभी ,
पूछने ही नहीं देता,
कि क्यों बनाया मुझे,
खुदा से ,
ये , 
खाली पेट |  

-मयंक 

Sunday, January 8, 2012

ज़िन्दगी या एक रेलगाड़ी

ज़िन्दगी


या एक रेलगाड़ी ,

कभी भागती सरपट,

और कभी रेंगती हुई,

उबाऊ,

कभी ख़त्म न होने वाले सफ़र सी ...

कभी अपना स्टेशन आने के पहले,

किसी अनजान जगह ,

घंटो खड़े रहने वाली उकताहट ,

या फिर ,

स्टेशन के आने के

ठीक पहले,

लाइन में सबसे आगे खड़े होकर ,

उतरने की जल्दी,

और आश्चर्य है कि,

ये जल्दबाजी तब भी थी,

जब रेलगाड़ी के अन्दर जाना था !!

कभी दरवाजे पे लटककर,

हवाओं को आँखे दिखाना,

और कभी,

दो - चार बूंदों से बचने के लिए,

सारी खिडकिया- दरवाजे बंद |

एक कम्पार्टमेंट ही जब,

पूरी दुनिया बन जाए,

या फिर दुनिया के सारे अजनबी,

एक ही कम्पार्टमेंट में ?

ज़िन्दगी फिर रेलगाड़ी क़ी तरह,

हर किसी को

उसके आखिरी स्टेशन पे पहुंचाती हुई,

कभी समय पर ,

कभी देर सबेर ,

और कभी कभी,

कभी नहीं ....

ज़िन्दगी रेलगाड़ी क़ी तरह ,

कही भागती सरपट

और कभी कभी ,

बहुत उबाऊ !!!

Monday, December 19, 2011

wife's initial effort to write a poem ...

कई यादें अब याद नहीं,
कई साथी अब साथ नहीं,
जिंदगी बिन तुम्हारे भी मुमकिन है ख्वाब नहीं |

वो हर ख्वाहिश से जुड़ा एक सपना ,
और हर सपने से जुडी एक ख्वाहिश,
जिंदगी उन सपनो के बिना भी आबाद है नाबाद नहीं |

यादें तो कुछ अब भी हैं ,
पर शायद उन यादों से जुड़े चेहरे बदल गए
सपने तो आँखें अब भी देखती हैं ,
पर शायद उन सपनो से जुड़े जज्बात बदल गए |


तुम फिर याद आओगे तो याद आएगा कोई सपना ,
पर फिर उस सपने को ओझल कर जाएगा कोई अपना
लगता है सपनो पर भी अधिकार बदलते हैं ,
जिंदगी से जुडी ख्वाहिशें और उनसे जुड़े ख्वाब भी बदलते हैं |


-Neha Sharma

Thursday, December 15, 2011

यूँ सोचता हूँ...


आज जो फुर्सत में हूँ तो यूँ सोचता हूँ,    
जरूरते क्या हैं और मैं क्या खोजता हूँ |
थोड़ी सी जमीन और क्या थोडा आसमान,
क्या मैं जिंदा हूँ जो जिंदादिली खोजता हूँ |

आज जो फुर्सत में हूँ तो यूँ सोचता हूँ, 
कि जब मैं आईने में अक्स देखता हूँ ,
शायद लकीरों में  खोया वक़्त देखता हूँ ,
जब मैं आईने के उस तरफ से देखता हूँ |

आज जो फुर्सत में हूँ तो यूँ सोचता हूँ, 
क्या मैं दोस्तों में भी हमजुबां ढूँढता हूँ ,
मैं किस पर भरोसा करू और कैसे करू ,
जब भरोसे में भी मैं फायदा देखता हूँ  |


आज जो फुर्सत में हूँ तो यूँ सोचता हूँ, |
कभी किसी ठोकर पे गिरा हूँ जब भी ,
तो सिर्फ मुझपे जमी नज़रों की है फ़िक्र ,
या कभी खुद खड़े होने की जुगत देखता हूँ |

तेरा किया सब तुम्हे ही हो मुबारक ,
मैं तुझमे कहाँ अब खुद को देखता हूँ ,
आजकल दूर जाते हुए सायों में अक्सर ,
मैं बेशर्मी से टूटता हुआ भरोसा देखता हूँ  |

आज कल जब फुर्सत है मुझे ,
तो मैं बहुत सोचता हूँ,
बहुत सोचता हूँ |
-मयंक गोस्वामी 

Sunday, November 20, 2011

वो परिंदे जब पेड़ो से उड़ गए

ये कविता विचलित मन के लिए ....

दिल में कितना शोर कर गए,
वो परिंदे जब पेड़ो से उड़ गए |
हम  साथ  में  हँसे , बहुत  हँसे
साथ  में  रोये,  बहुत  रोये |
फुर्सत मिली तो क्या सोचा कभी ,
उस मोड़ पे ही क्यों मुड़ गए |
सारे शौक अब अलमारी में रखे है,
तुम क्या गए,सब अरमान ले गए |
मैं नहीं चाहूँ तो भी क्या रुकता  है,
दिल है, अपनी मर्जी ही धड़कता है |
सफ़र में रहे और तुमको लगा कि,
शायद कुछ और ही जरूरी है ,
हम नीव के पत्थर ही तो  थे ,
गुमनाम है और बहुत नीचे दब गए |
जब मुड़ के देखो तो बहुत पीछे तक,
तो सिर्फ सन्नाटा ही है अब बीच में ,
और कुछ आवाजे आती है कभी कभी ,
कि,
हम  साथ  में  हँसे , बहुत  हँसे
साथ  में  रोये,  बहुत  रोये |
 

Saturday, November 12, 2011

दोस्ती और ...

ये पंक्तिया ४ महीने पहले लिखी गई थी... फ्रेंडशिप डे के दिन ..
 
 
आज  मेरी  पीठ  तेरी  तरफ  हो  तो  भी  खंजर  न  उठाना ,
आज  तो  दोस्तों  के  दिए  ज़ख्म  सहलाने  का  दिन  है ...
कभी  तो  दोस्त  होने  का  फ़र्ज़  अदा  कर  और  मुझे  बख्श  दे ,
कोई  कह  गया  है कि आज फिर तेरी दोस्ती को आजमाने का दिन है
  ...
 

Monday, August 22, 2011

मैं

इंसानियत का सबसे बदसूरत चेहरा हूँ,
हाँ मैं वही दो कान वाला बहरा हूँ |

मदद की गुहारे मुझे सुनाई न दे,
वो रौशनी रोकने वाला कोहरा हूँ |

मैं कंधो पे रास्तो की तरह चढ़ा हूँ,

मैं आदमी एक पर अन्दर से दोहरा हूँ |


मेरे साए मेरे साथ नहीं चलते ,
मैं सफ़ेद रौशनी वाला अँधेरा हूँ | 

Sunday, August 21, 2011

भीड़ में मेरा अकेलापन ...


मैं तुमको समझने की कोशिश में,
खुद को समझ रहा हूँ. 
यूँ लगता है कि मैं ,
खुद को खोल के पढ़ रहा हूँ  | 
कुछ उलझी - सुलझी सी ,
आधी - अधूरी सी,
कहानी की तरह ,
तुम एक पहेली जैसा ,
अंत हो मेरा |
मेरे सारे कयास,
मेरे सारे अनुमानों को ,
झुठला देती हो तुम .
कई बार खुद उलझकर ,
मुझको सुलझाती हो तुम |
कभी कथा व्यथा, 
कुछ सुनी अनसुनी ,
कविता की तरह ,
तुम एक पंक्ति का ,
अंत  हो मेरा |
मेरी सारी कमियों को ,
कितनी आसानी से 
छुपा देती हो तुम |
कई बार खुद को खोलकर,
मुझे पढ़ाती हो तुम | 
तुम जीवन हो,
उलझन हो, 
अनबन हो , 
सौंदर्य हो ,
पूर्णता हो | 
अपने सारे प्रयासों से भी ,
जो न कर सका ,
मेरे उस अपूर्ण स्वप्न का 
अंतिम जरिया हो तुम | 
तुम शरीर नहीं , 
आत्मा हो , 
और उस पर किसी का 
अधिकार नहीं , 
फिर भी कितनी चंचल ,
मोहक ,
महक, 
हंसी हो तुम  |
तुम केवल तुम हो ,
तुम रौशनी,
तुम उम्मीद , 
तुम आशा,
और तुम्ही अंत हो | 
तुम्हे पता है कि,
मैं क्या हूँ ,
फिर भी 
इस रास्ते के पत्थर  का  
देवता हो तुम |
मैं धूल ही सही , 
जो उड़ता हूँ ,
इधर उधर ,
फिर भी तुम तक पहुँचता तो हूँ ,
चाहे हर बार कोई मुझे ,
वहां से पोछ दे ,
पर मैं ,
कोई अवसर नहीं छोड़ता ,
तुम तक पहुचने का | 
मैं हसरत, 
मैं उम्मीद ,
मैं सपना 
बनकर जीना चाहता हूँ | 
मैं तुम्हारे स्पर्श को , 
अपने पास रखना चाहता हूँ |
तुम तक नहीं ,
तुम्हरी आत्मा तक
पहुचना चाहता हूँ | 
तुम्हारी सारी सफलताए ,
खुशियाँ ,
मेरे लिए धरोहर है ,
सारे जीवन के लिए 
उस याद को संजोकर,
अपनी स्मृति में रखना चाहता हूँ | 
तुम जीवन हो,
श्वाश,
धड़कन, 
चेतना ,
और तुम्ही सप्न्दन हो |
तुम हल हो 
जीवन कि पहेली का ,
सारी समस्याओं का 
समाधान हो तुम |
तुम हो तो ,
ईमान  है ,
तुम कारण हो ,
मेरे उजलेपन का ,
तुम मेरे ईमान का कारण हो | 
मेरे अकेलेपन में भीड़ हो तुम ,
और भीड़ में मेरा अकेलापन | 
तुम्ही कल्पना,
तुम्ही वास्तविकता ,
तुम्ही स्वप्न,
तुम्ही स्पर्श,
तुम्ही सनिध्याम 
तुम देवत्व हो , 
तुम्हारा हलके से खुद को नकारना , 
मुझे समझाना,
खुद को उलझाना , 
तुम सीमा हो एहसान की,
और मैं कृतज्ञ  हूँ , 
तुम्हारे साथ के लिए ,
जरूरत के वक़्त 
बड़े हुए उस हाथ के लिए | 
रोते वक़्त ,
कंधे के साथ के लिए | 
मेरे लिए ,
तुम कविता हो, 
कहानी हो,
और शायद 
पूरा एक काव्य हो | 
पर जो भी हो तुम ,
मुझे इतना पता है ,
कभी चाहे ,
तुम कितनी भी , 
कठिन,
अबूझ, 
मुश्किल,
क्लिष्ट हो जाओ ,
सबके लिए ,
पर उन सबसे अलग,
मेरे लिए आसान हो ,
और शायद इस जीवन में ,
सबसे महत्त्वपूर्ण , 
या,
एक शब्द में कहना चाहू ,
तो ,
अमूल्य हो तुम |

-- मयंक गोस्वामी 

फासला ?


दुःख से दुःख के बीच एक हंसी ही तो फासला है,   
वर्ना अब तक तेरे मेरे बीच में और बदला क्या है | 

सपनो की दुनिया में नींद नहीं आती थी तुमको,
और अब नींद में तुमने सपनो को ही तो बदला है | 

कितने अफ़साने अब बाकी रह गए तेरे मेरे बीच,
इन  सारी कहानियो का एक ही तो फलसफा है |

सच जानले कि मैं नहीं बदला पर तुझे ये दिक्कत है,
तेरे लिए  मेरी शख्सियत का सच ही तो बदला है |

मैं टूटकर यूँ ही इधर उधर बिखरता भी रहू तो क्या,
तेरे लिए तो तस्वीर का सिर्फ फ्रेम ही तो बदला है | 

मैं इतना नकारा नहीं समझा गया पहले कभी भी,
लेकिन इस बार देखो तो  हवाओं ने क्या रुख बदला है |

फूल या शूल ?


मैंने चुन रखे हैं 
वो सारे फूल ,
जो काम आने है मेरे जाते वक़्त,
(कौन फूल चढ़ाएगा मेरे जनाज़े पेउम्मीद कम ही है).
पर तेरी राह में आने वाले,
सारे शूल तो मैं ,
पहले चुन कर अलग रख दिए थे,
(उन्ही शूलों में ही तो पिरोई  है आखिरी माला ).
वैसे बहुत फर्क नहीं था,
जब चुन रहा था शूल,
वही तो अब फूल बन गए है,
मेरे आखिरी सफ़र के लिए.
और फूलों की बात कौन करेगा,
उनसे ही छिले है ,
मेरे हाथ ,
तुमने देखे नहीं ?
जब ख़ुशी ही दर्द देने लगे ,
तब ,
फूल और शूल में 
कितना फर्क रह जाता है,
बोलो ?
वैसे ,
मेरे अन्दर भी 
एक अदद  इंसान रहता था,
(जिसे दर्द भी होता हैसच! )
जाने कब पहचानोगे  तुम उसे ,
या फिर कभी ,
पहचानोगे तुम ?

Friday, August 12, 2011

ये आज़ादी कम है उनके लिए

ये आज़ादी कम है उनके लिए
उन्हें थोडा वक़्त  और चाहिए ..
अभी तो सिर्फ लूटा है देश,
उन्हें बेचने का हुनर चाहिए |
 
ये आज़ादी कम है उनके लिए ,
उन्हें थोड़ी और फ्रीडम  चाहिए.
अभी तो सिर्फ खून है निकाला,
इसकी नुमाइश का समय चाहिए |
 
ये आजादी कम है उनके लिए,
कि थोड़ी सहूलियत और चाहिए,
अभी तो गरीब का सिर्फ पेट है भूखा,
उन्हें भूख से बिकती आत्मा चाहिए |
 
ये आजादी कम है उनके लिए ,
कि कुछ लोग अभी भी खड़े है,
सपने तो ख़तम कर ही दिए है,
अब उन्हें गूंगी जुबान चाहिए |
 
ये आजादी कम है उनके लिए ,
अभी सिर्फ ६४ साल ही है बीते,
उन्हें १०० साल और दे दो कोई,
चिथडों में लिपटा हिन्दोस्तान चाहिए |

Saturday, January 15, 2011

आखिरी अलविदा ...

इस ब्लॉग पर मैंने आखिरी कविता कुछ दिन पहले लिखी थी.. लेकिन अब शायद कविता लिखने का हुनर गायब हो गया है रातो रात.. !! अब शायद कभी कुछ नहीं लिख पाऊंगा ... या हो सकता है कुछ दिनों बाद फिर से कोशिश करूँ ... ये ब्लॉग एक कोशिश थी कि जब मैं न रहू तब कोई तो इन कविताओं के द्वारा मुझे जान पाए.. पर लगता है अब कारण ख़तम हो गए है ...

नए कारण मिलने तक .. अलविदा..  हो सकता है ये आखिरी अलविदा हो या हो भी सकता है मैं वापस लौट कर भी आऊं .. लेकिन जब तक मैं वापस नहीं आता तब तक के लिए.. आप सब का शुक्रिया... यहाँ आने के लिए .. इसे सराहने के लिए.. आप सबका दिल से शुक्रगुजार हूँ... और शायद आप सब ही मेरी अगली प्रेरणा  बने जो मुझे कुछ और लिखने का कारण दे..

धन्यवाद ..
मयंक गोस्वामी

Monday, January 10, 2011

प्रेम -५

कुछ जल रहा है अन्दर,
दिल होगा ,
नहीं वो तो कब का ,
डस्ट बिन में फेक दिया था
तो इमोशंश ?
नहीं, वो तो तुमने कहा था,
कि कभी थे ही नहीं मुझमे ?
तो फिर कोई बीमारी है ?
कि अन्दर कुछ जला दे ,
ऐसी किसी बीमारी का नाम पता है ?
नहीं तो ..
तो फिर ?
ईर्ष्या होगी ..
हाँ मुझे अतीत से है ईर्ष्या ?
तुम डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाते ?
क्या दिखाऊ ?
शायद कोई सपना जला है ,
और धुंआ बन के उड़ गया ..
ऐसा भी होता है कभी,
कि सपने जल जाए ?
नहीं, सुना तो नहीं मैंने ,
लेकिन आँखों में चुभने वाले,
सपने देखे है ..
जब  लोग  बदलते  है , 
तो  शायद  सपने  जलते  हैं|
वही होंगे ..
झूठी उम्मीदों वाले सपने,
अच्छा हुआ जल गए |
नई शुरुआत करना..
लेकिन अब तो सपने ही नहीं दिखते,
तुमसे बात करना बेकार है,
पहले तो नहीं था ?
समय के साथ सब बदलता है,
लोग भी , अपने भी ?
इसके अलावा,
कोई और बात कर सकते हैं ?
कुछ है ही नहीं ?
मुझे नहीं करनी बात तुमसे |
यही तो जलाता है कुछ ..
शायद अपनापन ?
हाँ वही जलता है हर बार ,
और गाँठ छोड़ जाता है ,
फिर से जलने के लिए ...

Friday, December 10, 2010

अब अवशेष नहीं ...

मैं मुड़कर अब क्यों देखूं  पीछे ,
जहाँ  रहा अब कुछ शेष नहीं |
जीवन में चलना है, बढना है ,
नियति मेरी बनना अवशेष नहीं |
मैं अथक, अमिट रास्तो का राही,
लक्ष्य अनन्त है, कोई प्रदेश नहीं |
पथिक हूँ, साथी कई मिलते है ,
कोई बुरा नहीं, कोई विशेष नहीं |
मैं हूँ आभारी इस जीवन का ,
जिसने धैर्य दिया, आवेश नहीं |
मैं नहीं किसी पटल का ध्रुव तारा,
मैं विनम्र बहुत हूँ, आदेश नहीं |

Wednesday, November 24, 2010

प्रेम -४

मोहब्बत का रंग फिर दागदार निकला ,
इस बार भी वो एक किरदार निकला ..
जो खुशियों के चश्मे में नहाने गया था,
बाहर जब भी आया, तार तार निकला |
बहुत बेजुबां निकले  दर्द और अफ़साने,
उस गली से मैं फिर भी बार बार निकला |

Saturday, November 13, 2010

प्रेम - 3

काश कभी जो तुमसे शुरू हो ,
कोई एक ऐसी शाम हो जाए |
की गर तू कभी याद ना आए ,
तो ये शख्स गुमनाम हो जाए |
ज़िन्दगी में तू है, ये बहुत है  ,
ये सफ़र थोडा आसान हो जाए |
मैं क्यों तुझे यूँ देखू इस तरह,
कि तू बेवजह बदनाम हो जाए ?
ज़िन्दगी है रुक रुक के चलती है,
तेरी बाहों में ही अब शाम हो जाए | 
मैं थक जाता हूँ यहाँ पे आजकल,
अपना कन्धा दे, थोडा आराम हो जाए|
अब तू ही बस बोलती रहे सब कुछ,
मैं सुनु और दुनिया बेजुबान हो जाए | 

Monday, November 8, 2010

प्रेम ? - भाग -२

अपनी पिछली कविता प्रेम लिखने के बाद एहसास हुआ की बात तो अभी ख़त्म ही नहीं हुई,  तो सोचा कि मैं तब तक लिखूंगा इसे जब तक सब कुछ नहीं लिख डालता ... जो भी मन में है या जो भी देखा सुना है मैंने जीवन में .. तो पिछली कविता के आगे की बात भी पढ़िए .. इस कविता में ( इसके पहले अगर आपने मेरी कविता "प्रेम ?" न पढ़ी हो तो कृपया उसे एक बार पढ़े ताकि प्रवाह बना रहे, इस कविता के ठीक नीचे है  ) .

मैं अब तक यही समझा,
कि तुमने प्रेम भी किया है,
तो दया जानकर,
और मैं याद भी करता हूँ ,
तो दुआ मानकर |
तेरे न होने का ,
इतना फर्क तो पड़ा है मुझे ,
कि अब रातो को जागता हूँ,
मैं इबादत जानकर |
तुम्हारे स्पर्श को धो डालने की,
वो सारी कोशिशे,
जब नाकाम हो गई,
तो अपना लिया है मैंने,
उसे भी रिवाज़ मानकर |
तुमसे हुई उन सारी बातो का,
एक गट्ठा,
मैं अपने साथ लेकर,
चल रहा हूँ,
इस उम्मीद में,
कि किसी दिन शायद,
इसे पढने की शक्ति
मुझे मिल जायेगी |
तुमने तो अब
बोलना भी बंद कर दिया है ,
मुझसे,
मैं भी चुप बैठ जाता हूँ,
खुद को गूंगा मानकर |
मैं तुम तक पहुचने की,
कोशिशो में
अब भी जुटा हुआ हूँ,
तेरी यादो को ही,
एक सीढ़ी मानकर |
मैं उतना सफल न हो पाया,
न प्रेम में, न जीवन में,
जो पर्याप्त हो पाता,
तुम्हारे लिए,
पर अभी भी,
थोडा परेशान हूँ ,
कि,
प्रेम का मापदंड ,
क्या ये भी होता है?
पर तुम्हे तो पता है,
तेरी हर बात को,
मान तो लेता था मैं,
गीता का जानकर,
गंगा सा मानकर |