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Sunday, January 8, 2012

ज़िन्दगी या एक रेलगाड़ी

ज़िन्दगी


या एक रेलगाड़ी ,

कभी भागती सरपट,

और कभी रेंगती हुई,

उबाऊ,

कभी ख़त्म न होने वाले सफ़र सी ...

कभी अपना स्टेशन आने के पहले,

किसी अनजान जगह ,

घंटो खड़े रहने वाली उकताहट ,

या फिर ,

स्टेशन के आने के

ठीक पहले,

लाइन में सबसे आगे खड़े होकर ,

उतरने की जल्दी,

और आश्चर्य है कि,

ये जल्दबाजी तब भी थी,

जब रेलगाड़ी के अन्दर जाना था !!

कभी दरवाजे पे लटककर,

हवाओं को आँखे दिखाना,

और कभी,

दो - चार बूंदों से बचने के लिए,

सारी खिडकिया- दरवाजे बंद |

एक कम्पार्टमेंट ही जब,

पूरी दुनिया बन जाए,

या फिर दुनिया के सारे अजनबी,

एक ही कम्पार्टमेंट में ?

ज़िन्दगी फिर रेलगाड़ी क़ी तरह,

हर किसी को

उसके आखिरी स्टेशन पे पहुंचाती हुई,

कभी समय पर ,

कभी देर सबेर ,

और कभी कभी,

कभी नहीं ....

ज़िन्दगी रेलगाड़ी क़ी तरह ,

कही भागती सरपट

और कभी कभी ,

बहुत उबाऊ !!!

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