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Friday, November 27, 2009

saamna

आंधियो के बीच खड़े

उस पेड़ को देखो,
हजारो बार झुका है,
जीता नहीं फिर भी खड़ा है
हारा है तो क्या हुआ,
कह तो सकता है,
कि देखो,
चाहे कमजोर हूँ मैं,
पर मैंने हर बार लड़ा है

साहिल पे वजूद खोती,
लहरों का जज्बा,
भी क्या अजीब है,
उसने भी किनारे की,
उस चट्टान को,
तोड़ने का सपना लिया है
और उस लहर का,
सामना करने को,
वह पत्थर भी सदियों से,
वही पड़ा है |

और एक मैं हूँ,
जो कहता हूँ की,
बिखर जाने दो मुझे,
ये वक़्त मुझे,
तोड़ने पे तुला है |

किसने लहरों से सीखा है,
हर बार वजूद खोया,
तो क्या हुआ ,
अगली कोशिश में,
हर बार जोश ही
दुगुना किया है  |
और कभी उस चट्टान की,
जिद को देखो,
वह कब लहर के ,
रास्ते से हटा है  |

1 comment:

praveen said...

Dost bahut achha likhte ho aap. aur aapki Saamna mujhe bahut achhi lagi. Its really very inspirable for us. Keep wriring. Best of luck.