कविताएं और भी यहाँ ..

Tuesday, December 15, 2009

ख़ामोशी को भी सुना है |

सीने   में  टूटन  सी  इतनी  क्यों  है ,
हालात  से  क्यों  झगडा  हुआ  है  |
जहा  से  चले  थे  वही  पे  खड़े  है ,
दिल  जाके  तुझपे  ही  अटका  हुआ  है  |
वो  रास्ता  दिखाने  आया  था  मुझको ,
जो  पहले  ही  कही  गुमशुदा  हुआ  है  |
खुशनुमा  है  राते  फिर  भी  क्यों  ग़म  है ,
उम्मीद  पर  ही  तो  चाँद  लटका  हुआ  है |
इनायत  है  तेरी  कि  मुझको  यु  देखा ,
नहीं  तो  अभी  तक  ये  अनदेखा  हुआ  है  |
उसकी  आँखों  में  यु  डर दिख  रहा  है
वो  प्यार  के  नाम  से  ही  सहमा  हुआ  है  ..
तमन्ना  थी  चिरागों  से  अँधेरे  बुझायेगे ,
रौशनी  कि  उम्मीद  में   घर  ही  जला  है  |
कही  तो  साजिश   करती  है  ये  बारिश ,
मिटटी  के  घरोदो  में  ही  पानी  घुसा  है  |
साँसों का   चलना   तुझसे   ही   मुमकिन ,
जिन्दा हूँ जब  तक  तूने  थामा  हुआ  है |
तू   रगों   में  दौड़ता   रहे  भी तो   क्या ,
नदी   का   पानी   कब   नदी   का   हुआ  है |
तेरे  आने  कि  कोई  दस्तक  भी  नहीं  हुई ,
वर्ना  हमने  तो  ख़ामोशी  को  भी  सुना है  |

1 comment:

Anonymous said...

Awesome...
poem with a deep meaning
feels as in the relationship is not superficial but is deeply rooted inside you..
kya baat hai mayank babu.........
kaun hai wo ;)